क्या यह एकता बनाम बंटवारे की राजनीति की नई कहानी है?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह सिर्फ एक बयान नहीं, बल्कि एक संकेत है — एकता ही वर्चस्व की कुंजी है।वारिस पठान का यह दावा बिहार की राजनीति में विशेष रूप से गूंज रहा है।
दिल्ली में एक न्यूज चैनल में डिबेट के दौरान बीजेपी प्रवक्ता डॉ सुधांशु त्रिवेदी और असद्दुदीन की पार्टी के प्रवक्ता वारिस पठान के बीच चुनाव को लेकर बहस हुई , जिसमें वारिस पठान के बयान ने सियासी गलियारों में नई हलचल पैदा कर दी है। Bjp प्रवक्ता डॉ सुधांशु त्रिवेदी ने इसी को कोट करते हुए सवाल खड़े कर दिया। उन्होंने पठान को जवाब देते हुए कहा कि, “वारिस पठान ने मंच से ठोंक कर कहा कि “देश में 19 फीसदी मुसलमान हैं” , लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि उनमें कौन शेख है, कौन सैयद, कौन पठान या कौन जुलाहा है!”पठान ने जोर देकर कहा कि यही मुस्लिम समाज की असली ताकत है—एकता की ताकत।
उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा कि “जहां 20 फीसदी ठोस हैं, वहीं बाकी 80 फीसदी जात की चोट झेल रहे हैं।”अब सवाल उठता है — क्या यही वजह है कि मुस्लिम समाज एकजुट होकर राजनीतिक रूप से ज्यादा प्रभावशाली हो जाता है?और क्या हिंदू समाज अपनी आंतरिक जातीय खींचतान के चलते कमजोर पड़ रहा है?
बिहार से लेकर दिल्ली तक, वारिस पठान के इन शब्दों ने बहस छेड़ दी है। वे कहते हैं, “जो समाज एकजुट रहता है, उसकी बात पर झुकना पड़ता है।”
उन्होंने लालू प्रसाद यादव और उनके परिवार का नाम लेते हुए कहा कि “गोपाष्टमी के दिन भी ये लोग कुछ नहीं कर सके, जबकि इमारत-ए-शरीया के मंच पर तेजस्वी यादव को बुला लिया गया।”अब देखना यह है कि यह बयान आने वाले चुनावी माहौल में क्या नया राजनीतिक समीकरण गढ़ता है।
