जहां देश के कई हिस्सों में आरक्षण या जातिगत जनगणना (UGC/Caste discussions) को लेकर तीखी बहसें होती हैं, वहीं सौंदाला ने दिखाया है कि स्थानीय स्तर पर इच्छाशक्ति हो तो समाज को एकजुट रखा जा सकता है।
सबसे सटीक बात यह है कि पिछले 10 वर्षों में इस गांव में अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (Atrocities Act) के तहत एक भी मामला दर्ज नहीं हुआ है। यह आंकड़ा साबित करता है कि यहाँ का भाईचारा केवल कागजी नहीं बल्कि जमीनी हकीकत है।

जी हां यह खबर महाराष्ट्र के अहिल्यानगर (पूर्व नाम अहमदनगर) जिले के नेवासा तालुका में स्थित सौंदाला गांव की है, जो आज पूरे भारत के लिए सामाजिक एकता का एक चमकता हुआ उदाहरण बन गया है।
5 फरवरी, 2026 को हुई ग्राम सभा में सरपंच शरद अरगड़े के नेतृत्व में यह ऐतिहासिक फैसला लिया गया। इस प्रस्ताव का मुख्य उद्देश्य कागजों से परे हटकर वास्तविक जीवन में भेदभाव को समाप्त करना है। गांव की 2500 की आबादी में मराठा, अनुसूचित जाति, ईसाई और मुस्लिम परिवार दशकों से बिना किसी मनमुटाव के रह रहे हैं। इन सब का श्रेय जाता है गांव के कड़े और प्रगतिशील नियमों को जिसमें इस प्रस्ताव के तहत केवल भाषण नहीं, बल्कि कुछ ठोस नियम बनाए गए हैं:
- सार्वजनिक स्थानों पर पूर्ण समानता: मंदिर, स्कूल, जल स्रोत और श्मशान घाट सभी जातियों और धर्मों के लिए समान रूप से उपलब्ध हैं।
- सोशल मीडिया पर लगाम: यदि कोई व्यक्ति सोशल मीडिया पर जातीय या धार्मिक नफरत फैलाने वाला पोस्ट डालता है, तो ग्राम पंचायत उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान रखती है।
- शिक्षा का केंद्र: गांव के जिला परिषद स्कूल के शिक्षक अशोक पंडित के अनुसार, बच्चों को शुरुआत से ही सभी धर्मस्थलों का सम्मान करना सिखाया जाता है, ताकि अगली पीढ़ी में “ऊंच-नीच” का विचार ही पैदा न हो।

केवल जाति ही नहीं, कुप्रथाओं पर भी वार
सौंदाला गांव पिछले कुछ समय से लगातार सुधारवादी फैसले ले रहा है:
- विधवा विवाह को प्रोत्साहन: सितंबर 2024 में, गांव ने विधवा पुनर्विवाह करने वाले जोड़े को 11,000 रुपये की प्रोत्साहन राशि देने का निर्णय लिया।
- गाली-मुक्त गांव: नवंबर 2024 में, गांव ने महिलाओं के सम्मान में उन गालियों पर प्रतिबंध लगा दिया जो स्त्री-विरोधी होती हैं। आज यह गांव अपनी शालीन भाषा के लिए भी जाना जाता है।

