बाज़ार के साथ विज्ञान और तकनीकी की भाषा बने हिन्दी

प्रो. संजीव कुमार दूबे ,
अधिष्ठाता, भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अध्ययन संस्थान, गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय
नागपुर में पहले विश्व हिन्दी सम्मेलन के आयोजन की तिथि 10 जनवरी को विश्व हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस आयोजन से विश्व हिन्दी की अवधारणा का आग़ाज़ माने तो लगभग पचास साल से हम विश्व भाषा के रूप में हिन्दी की प्रतिष्ठा के प्रयास में लगे हुए हैं। अब तक 12 विश्व हिन्दी सम्मेलनों का आयोजन हो चुका है। चार साल के अंतराल पर आयोजित होने वाले पिछले विश्व हिन्दी सम्मेलन से अगले विश्व हिन्दी सम्मेलन के बीच विश्व भाषा के रूप में हिन्दी की प्रगति का ग्राफ़ उसी बिंदु पर ठस दिखना बताता है कि ठोस कार्रवाई की ज़रूरत है। विश्व भाषा के रूप में हिन्दी की प्रतिष्ठा की ज़िम्मेदारी सरकार से ज़्यादा हिन्दी भाषी जनता की है।

आमतौर पर हिन्दी भाषियों में अपनी भाषा में बोलने-लिखने में हीनता बोध नज़र आता है तो दूसरी भारतीय भाषा सीखने में गहरी उदासीनता दीखती है। जब तक हिन्दी भाषियों में दूसरी भारतीय भाषा सीखने की ललक और अपनी भाषा बरतने का गौरव बोध नहीं जागृत होगा तब तक हिन्दी भाषा न तो देश की राष्ट्र भाषा का गौरव प्राप्त कर पाएगी न विश्व भाषा बन पाएगी।
हम भारतीय अपने लेखन और बोलचाल में कई भाषाओं और लिपियों का प्रयोग करते आ रहे हैं, लेकिन हिंदी एक ऐसी भाषा है जो हम सभी को आपस में जोड़कर रखती है और हिंदी की लिपि देवनागरी है. हम भारतीयों के लिए हिंदी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि यह हमारी पहचान है, इसमें हम अपनी भावनाएं जाहिर करने में बहुत ही समझ महसूस करते हैं, तभी तो हम बड़े गर्व से कहते हैं “हिंदी हैं हम”.
कुछ सतही राजनीतिक विरोधों को छोड़ दिया जाए तो हिंदीतर भाषियों और राज्यों में हिन्दी पर्याप्त स्वीकृति प्राप्त कर चुकी है। ज़रूरत है कि देश विदेश के वैज्ञानिक, तकनीकी एवं प्रबंधन क्षेत्र में सक्रिय हिन्दी भाषी अपने ज्ञान और अनुभव को हिन्दी भाषा में अभिव्यक्त करें। दूसरी ओर हिन्दी भाषा से भलीभाँति परिचित हिन्दी शिक्षक एवं अनुवादक दूसरी भाषाओं में लिखी ज्ञान के विविध अनुशासनों की पुस्तकों को हिन्दी में अनुदित करें। एक ऐसा विशाल ऑनलाइन मंच उपलब्ध कराया जाना चाहिए जहां कोई भी अपनी पुस्तक को हिन्दी अनुवाद के लिए उपलब्ध करा सके तथा बड़ी मात्रा में हिन्दी सेवी स्वेच्छा से अनुवाद कर सकें। इसी तरह एक दूसरा मंच संपादन के लिए बनाया जाए जहां पर अपलोड की गई हिन्दी सामग्री का स्वैच्छिक संपादन संभव हो। ध्यान रहे कि सिर्फ़ बाज़ार की भाषा बन जाने से हिन्दी विश्व भाषा नहीं बन सकती। ज्ञान विज्ञान की भाषा बन कर ही हिन्दी विश्व भाषा की अधिकारिणी बन सकेगी।
दुनिया के कोने -कोने में बसे भारतीय लोगों को अपने राष्ट्र के स्वाभिमान की भाषा के रूप में हिन्दी का व्यवहार करना होगा। दुनिया के किसी भी कोने में एक भारतीय की उपस्थिति को हिन्दी की उपस्थिति के रूप में सुनिश्चित कर के ही हिन्दी को विश्व भाषा बनाया जा सकता है। मनुष्य के लिए भाषा का मुद्दा व्यावहारिक ज़्यादा है भावनात्मक कम। व्यवहार और भावना में संतुलन साध कर ही अपनी भाषा को विश्व स्तर पर आगे बढ़ाया जा सकता है। भाषा हमारी अस्मिता से जुड़ी होती है, हमारी पहचान का ज़रिया होती है। मातृभाषा हमारी पारिवारिक-सामाजिक पहचान की भाषा है पर हमारी राष्ट्रीय पहचान की भाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी को स्वीकार करने का संकल्प हर भारतवासी को लेना चाहिए ।
