धर्म के मामले धर्माचार्यों के पास ले जाएँ , फौजदारी और सम्पत्ति के मामले कोर्ट में – शङ्कराचार्य अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती ‘१००८’
मुंबई,
न राज्यं नैव राजासीत् न दण्ड्यो न च दाण्डिकाः।
धर्मेणैव प्रजाः सर्वां रक्ष्यन्ते स्म परस्परम्।।
एक समय था जब हमारे देश में न राज्य था, न राजा। न दण्ड था न दाण्डिक न्यायाधीश। धर्म सबके जीवन में था जिससे सारे समाज की परस्पर रक्षा हो जाती थी। समय बदला तो दुष्ट बलवानों ने निर्बलों को सताना शुरू किया। ऐसे में न्यायालयों की आवश्यकता पड़ी, राजा की आश्यकता हुई। इससे जनता को तात्कालिक रूप से लाभ हुआ पर धीरे-धीरे उसमें भी संवेदनशीलता की कमी आने लगी और आज वह न्याय कम और प्रोसीजर ज्यादा हो गया है। ऐसा हम नहीं उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश ने ही कहा है।
समय-समय पर अलग-अलग सन्दर्भों में विधि विशेषज्ञों ने बताया है कि संविधान की धारा 14 धारा 25 के ऊपर अधिमान नहीं पानी चाहिए। अदालतों को यह तय नहीं करना चाहिए कि धर्म के आवश्यक तत्व क्या हैं? यह भी कि न्यायालयों को धार्मिक अभ्यासों व परम्पराओं में तब तक के सिवाय कोई हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए जब तक कि वह किसी बुराई अथवा शोषण प्रक्रिया को बढ़ावा न दे रही हों। संविधान की धारा 26 बी के अनुसार धार्मिक क्रियाओं के सम्पादन के अधिकार में अदालतों को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। साथ ही धर्म सम्बन्धित लाखों मुकदमे देश की न्यायालयों में लम्बे समय से लम्बित चल रहे हैं।
भारतीय न्यायालयों के भार को कम करने, उन्हें आवश्यकता पर धार्मिक विशेषज्ञता उपलब्ध कराने और धार्मिक मामलों को धार्मिक गहराई के साथ निर्णीत कराने के उद्देश्य से व्यक्तिगत स्तर पर एक धार्मिक न्यायालय के गठन का निर्णय विगत प्रयागराज के कुम्भ पर्व के अवसर पर आयोजित परमधर्मसंसद् १००८ में २०८१ वि. माघ कृष्ण द्वादशी तदनुसार दिनाङ्क 26 जनवरी 2025 ई. को लिया गया था। आज हम इस धर्म न्यायालय के गठन की औपचारिक घोषणा कर रहे हैं।

जिस प्रकार चिकित्सक का काम पडने पर अधिवक्ता काम नहीं आता ऐसे ही धर्म के निर्णयों में परम्परागत रूप से अध्ययन किए हुए और धर्म को अपने जीवन में आचरित करने वाले धर्माचार्य ही उपयुक्त होते हैं। यह कहा भी गया है कि – जिसका काम उसी को सोहे।
अनेक अवसरों पर यह देखा जा रहा है कि न्यायालय से धर्म सम्बन्धी निर्णय में धार्मिक बारीकियों की अनदेखी की जा रही है। अतः इस बात की आवश्यता अनुभूत की जा रही है कि धर्म का निर्णय धर्माचार्य ही करें। इससे न्यायालय का भार भी कुछ कम होगा और धर्म के विषयों में सही निर्णय जनता को प्राप्त हो सकेगा। अस्तु।
यदि हर गाय गाय है तो दूध-दूध में अन्तर क्यों?
प्राचीन समय से ही गाय और गवय में भेद हमारे शास्त्रों में बताया गया है। असली और नकली की लड़ाई नयी नहीं है। जो असली होता है उसी की नकल बाजार में होती रहती है। पर यह कह देना कि असली और नकली दोनों एक ही है यह निश्चित रूप से गलत होगा। पीला दिखने वाली हर चीज सोना तो नहीं हो सकती। ऐसे ही गाय जैसी दिखने वाला हर जीव गाय नहीं हो सकता इसे स्पष्ट रूप से समझ लेना होगा। वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह कहा गया कि गाय और गाय में क्या भेद है? हम यह पूछना चाहते हैं कि यदि गाय और गाय में कोई भेद नहीं है तो दूध-दूध में भेद क्यों किया जाता है? एक गाय के दूध को ए2 मिल्क और दूसरे गाय के दूध को ए1 नाम देकर क्यों अन्तर दिखाया जा रहा है? और फिर गाय का भी नाम गुणवत्ता के आधार पर बोस इण्डिकस और दूसरे को बोस टोरस क्यों कहा जा रहा है? स्वाभाविक है कि दूध की गुणवत्ता के आधार पर ही यह भेद होता है। यदि दूध-दूध सब एक ही होता तो गाय के दूध और कुतिया के दूध में अन्तर न मानकर लोग गाय का दूध छोड़ सकते थे। परन्तु सर्वत्र यह प्रसिद्ध है कि गाय की दूध ही सर्वश्रेष्ठ है।
मांसाहारी गाय का दूध भारतीय संस्कृति में अस्वीकार्य
जो संकर गाय (हाईब्रीड) या कुछ विदेशी गाय जो वस्तुतः गाय न होकर गवय है। क्योंकि जिसको सनातन धर्म में गाय कहा गया है उसके लक्षण, आचरण, दिखावा कुछ भी गाय जैसा नहीं है। उन विदेशी गायों को कैटल फूड में मांस प्रोटीन दिया जाता है। मांसाहारी मनुष्य भी मांसाहारी पशु को नहीं खा सकता या उसका दूध उपयोग में नहीं ले सकता। हमारे धर्म में तो मांसाहारी का दूध सर्वथा त्याज्य है। अतः अमेरिका द्वारा भारत में मांसाहारी गाय के दूध को बेचने की संभावना का हम अभी से विरोध करते हैं |
गौमाता घोषित हो राष्ट्रमाता 33 कोटि देवताओं को जगाने को गो-प्रतिष्ठा महायज्ञ
गौ माता को राष्ट्रमाता का सम्मान दिलाने के लिए गौभक्तों की ओर से अनेक अन्य कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं परन्तु कोई भी कार्य दैवी शक्ति के बिना सफल नहीं हो सकता। इस महत् सङ्कल्प की पूर्ति के लिए आध्यात्मिक शक्ति के सञ्चयन के लिए गौमाता के शरीर में निवास कर रहे 33 कोटि देवी देवताओं के निमित्त 33 कोटि आहुति यज्ञ के क्रम में आपके मुम्बई महानगर में गो प्रतिष्ठा महायज्ञ का आरम्भ हो चुका है। यहाँ की तत्कालीन सरकार को धन्यवाद ज्ञापित करते हुए हम चाहते हैं कि गौमाता अब शीघ्र ही राष्ट्रमाता भी घोषित हो। आज दिन तक तीन करोड़ से अधिक आहूतियाँ हो भी जा चुकी हैं और यज्ञ निरन्तर चल रहा है |
जो अपराधी नहीं उसे छोडने के साथ ‘अपराधी कौन’ क्या यह बताना जरूरी नहीं ?
न्यायालय में जब किसी पर अभियोग सिद्ध नहीं होता तब उसको निरपराधी कहकर छोड़ दिया जाता है। केवल इतने से ही रक्षा हो जाती है क्या? दोषी तो फिर भी खुले आम घूमता है। न्यायालय का काम है अपराधी को दण्डित करना और निरपराधी को मुक्त करना। उसमें से यदि एक ही काम हुआ कि निरपराधी मुक्त हो गया जैसा कि वर्ष 2006 में मुम्बई ट्रेन बम हादसे में 189 लोगों की मृत्यु हो गयी और 19 वर्ष बाद 11 आरोपी को बरी किया गया। इस अवस्था में उस हादसे के अपराधी खुले आम घूम रहे हैं और तब तो अपराध की श्रृंखला बढती जाएगी। अपराध तब ही रोका जा सकता है जब ये दोनों कार्य न्यायोचित ढंग से हो।
शासक का कर्तव्य कि वे हर प्राणी के जीवन की रक्षा करे
मनुष्य और अन्य जीवों के सहअस्तित्व को बनाकर ही प्रकृति का सन्तुलन बनाया जा सकता है। यह पृथ्वी केवल मनुष्यों के लिए नहीं निर्माण हुई, सभी जीवों के परस्पर सामञ्जस्य से ही सन्तुलन बना रहेगा। वर्तमान समय मे चल रहे कबूतरों को दूर भगाने और दाना न खिलाने के सन्दर्भ में हमारा यह कहना है कि सनातन धर्म में सभी प्राणियों की रक्षा की बात कही गयी है। यह पृथ्वी केवल मनुष्यों के लिए ही निर्मित नहीं हुई। यहाँ पशु-पक्षी आदि का भी सहअस्तित्व स्वीकार किया गया है। पक्षियों को दाना डालना कोई नयी बात नहीं है। ऐसा करके लोग परोपकार के साथ-साथ अपनी ग्रहपीड़ा के नाश का भी उपाय करते देखे जाते हैं।
श्रीमदभागवत में राजा रन्तिदेव का प्रसङ्ग आया है जिसमें उन्होंने कहा है कि –
न त्वहं कामये राज्यं न स्वर्ग नापुनर्भवम् ।कामये दुःखतप्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम् ॥
माने सत्ता की इच्छा नहीं, राज्य का सुख नहीं चाहते पर हर किसी दुःखी प्राणियों की पीड़ा हरना चाहते है ।
यह शासक का दायित्व है कि राज्य में रहने वाले हर जीव के विषय मे सद्भावपूर्ण विचार हो। अपराधी की बात को भी न्यायालय में सुना जाता है, फिर यथोचित न्याय होता है, तब तो निरपराधी पक्षी के विषय में कोई भी निर्णय जल्दबाजी में न होना चाहिए। कबूतरों के मल-मूत्र को लेकर कुछ बीमारियाँ फैलती हैं, उनके आवासीय या शहरी विस्तार में रहने पर कई बार अकस्मात होते भी हैं, पर उनकी ओर सर्वथा क्रूरता दिखाना प्रकृति के सन्तुलन को बिगाड़ने का दुष्कृत्य है, जिसके दुष्परिणाम आ सकते है।
चीन में एक बार इसी प्रकार की घटना को 1958 में देखा गया हैं जहाँ चिड़ियों के द्वारा खेत बर्बाद होने पर चिड़ियों को मारने का सर्क्युलर बनाया गया, जब चिड़िया खत्म होने लगी तो दूसरे विषाक्त जीव फसलों को तबाह करने लगे। अन्ततः चीन को निर्णय वापस ही नहीं लेना पड़ा अपितु चिड़ियों को वसाना पड़ा तो प्रकृति के सन्तुलन को बिगाड़ने का दुष्परिणाम आता है ।
मनुष्य की अपनी सहूलियत की चाह में लगातार वायु, जल, भूमि प्रदूषण बढ़ रहे हैं। ऊपर से पशु पक्षी या जीवों को अपनी सहूलियत के लिए मारकर प्रकृति और पर्यावरण का सन्तुलन बिगाडते हुए अन्य जीवों को पीड़ित करने में मानव जाति बढ़ी जा रही है यह सचमुच बड़ा खतरनाक साबित होगा। कबूतरों से होते संक्रामक रोग से बचने का उपाय सोचने के बदले उसकी जाति को ही खत्म कर देना न्याय नहीं हो सकता, इस हिसाब से देखें तो मनुष्य से हर प्राणी को खतरा है, अरे मनुष्य तक को खतरा है तो क्या अन्य जीवों के विषय को लेकर मनुष्य को दण्डित किया जाता है? किसी के अस्तित्व को मिटाने का अधिकार किसी भी व्यक्ति या शासक का नही हो सकता। इस पर गम्भीरतापूर्वक विचार होना चाहिए और मुंबई के मनुष्य निवासियों के साथ ही साथ यहाँ के कबूतरों का भी ध्यान रखा जाना चाहिए |
