— नारायण जाधव
किसी देश की असली संपत्ति केवल उसके केंद्रीय बैंक के खजाने में नहीं होती, बल्कि वह स्कूलों की कक्षाओं, विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों और शोध प्रयोगशालाओं में तैयार होती है। किसी राष्ट्र की ऊंचाई उसकी गगनचुंबी इमारतों से नहीं, बल्कि उसके वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं, पेटेंट और नवाचारों से मापी जाती है। इसलिए 21वीं सदी में दुनिया की प्रतिस्पर्धा अब केवल भूभाग, सैन्य शक्ति या प्राकृतिक संसाधनों की नहीं रह गई है।
“आज असली दौड़ ज्ञान की है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम तकनीक, जैव प्रौद्योगिकी, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष अनुसंधान, हरित ऊर्जा और अत्याधुनिक रक्षा तकनीक जैसे क्षेत्रों में जो देश आगे होगा, वही भविष्य की दुनिया का नेतृत्व करेगा।”
भारत आज विकसित राष्ट्र बनने का सपना देख रहा है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत, पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था, वैश्विक विनिर्माण केंद्र, डिजिटल महाशक्ति और सेमीकंडक्टर हब जैसी महत्वाकांक्षी योजनाएँ देश के सामने रखी गई हैं। देश में राजमार्ग बन रहे हैं, मेट्रो का विस्तार हो रहा है, हवाई अड्डों का आधुनिकीकरण हो रहा है और बंदरगाह विकसित किए जा रहे हैं। यह विकास निश्चित रूप से आवश्यक है, लेकिन इन सबके बीच एक बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा है—जिस ज्ञान पर भविष्य की दुनिया टिकी होगी, उस शिक्षा और अनुसंधान पर हम कितना खर्च कर रहे हैं? और उससे भी बड़ा सवाल यह है कि जो बजट आवंटित किया जाता है, क्या उसका पूरा उपयोग भी हो पाता है?
इसी महीने इस सवाल को और प्रासंगिक बनाने वाली एक घटना सामने आई।
“कोलंबिया में आयोजित 56वें अंतरराष्ट्रीय भौतिकी ओलंपियाड में भारत के पाँचों छात्रों ने स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया। पुणे के कनिष्क जैन, इंदौर के ऋद्धेश अनंत बेंडाले, दिल्ली के ऋषित गर्ग, मुंबई के श्रेष्ठ सुरैया और अहमदाबाद के स्वरित जोशी ने 85 से अधिक देशों के प्रतिभागियों को पीछे छोड़ते हुए भारत को संयुक्त रूप से शीर्ष स्थान दिलाया।”
विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी चीन, रूस, दक्षिण कोरिया, ताइवान और कजाखस्तान जैसे देशों के साथ भारत मजबूती से खड़ा दिखाई दिया।
यह उपलब्धि हर भारतीय के लिए गर्व का विषय होनी चाहिए थी। लेकिन साथ ही एक सवाल भी मन में उठता है—इन पाँच छात्रों के नाम कितने भारतीय जानते हैं? हमें क्रिकेटरों के रिकॉर्ड, फिल्मी सितारों के जन्मदिन और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स के लाखों फॉलोअर्स याद रहते हैं, लेकिन दुनिया की सबसे कठिन विज्ञान प्रतियोगिता में देश का नाम रोशन करने वाले इन छात्रों को हम शायद ही पहचानते हों। यह समाज की कमी है या मीडिया की, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि हमने विज्ञान और ज्ञान को अभी तक राष्ट्रीय गौरव का विषय नहीं बनाया है।
“अंतरराष्ट्रीय भौतिकी ओलंपियाड कोई सामान्य परीक्षा नहीं है। इसमें पाँच घंटे की सैद्धांतिक और पाँच घंटे की प्रायोगिक परीक्षा होती है। विद्यार्थियों को अपरिचित उपकरणों पर प्रयोग करने होते हैं, स्वयं निष्कर्ष निकालने होते हैं, गणितीय विश्लेषण करना होता है और विज्ञान के मूल सिद्धांतों की गहरी समझ साबित करनी होती है। यहाँ न तो बहुविकल्पीय प्रश्न होते हैं और न ही रटकर सफलता मिलती है। यहाँ केवल जिज्ञासा, तर्कशक्ति और वैज्ञानिक सोच की परीक्षा होती है।”
इस सफलता के पीछे मुंबई स्थित होमी भाभा विज्ञान शिक्षा केंद्र (HBCSE) और टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान (TIFR) की दशकों से चली आ रही कठोर और व्यवस्थित प्रशिक्षण प्रणाली है। देशभर से हजारों छात्रों का चयन, राष्ट्रीय ओलंपियाड, प्रशिक्षण शिविर, प्रयोगशालाओं में कठिन परीक्षण और अंततः अंतिम पाँच छात्रों का चयन—यह पूरी प्रक्रिया साबित करती है कि भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है। बल्कि दुनिया की सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक प्रतिभाएँ तैयार करने की क्षमता हमारे पास है।
लेकिन इसके बाद सबसे बड़ा प्रश्न सामने आता है—यह प्रतिभा आगे कहाँ जाती है? ओलंपियाड में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले अनेक छात्र आगे चलकर दुनिया के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में शोध करते हैं और उनमें से कई वहीं बस जाते हैं। इसमें कोई गलत बात नहीं है, क्योंकि विज्ञान की कोई सीमाएँ नहीं होतीं और प्रतिभा को अवसर तलाशने का पूरा अधिकार है। फिर भी एक राष्ट्र के रूप में हमें स्वयं से पूछना चाहिए कि जिन प्रतिभाओं को हम खोजते और तैयार करते हैं, उन्हें विश्वस्तरीय शोध का वातावरण अपने ही देश में क्यों नहीं दे पाते?
इसका उत्तर हमारे बजट के आँकड़े देते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षा पर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 6 प्रतिशत खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है, लेकिन केंद्र और राज्यों का संयुक्त सार्वजनिक व्यय अभी भी लगभग 4 प्रतिशत के आसपास है। वहीं अनुसंधान एवं विकास (R&D) पर भारत का खर्च केवल 0.6 से 0.7 प्रतिशत GDP के बीच है। इसके मुकाबले दक्षिण कोरिया 5 प्रतिशत से अधिक, इज़राइल लगभग 5 प्रतिशत, अमेरिका लगभग 3.5 प्रतिशत, जर्मनी और जापान 3 प्रतिशत से अधिक तथा चीन 2.5 प्रतिशत से अधिक खर्च करता है। यह केवल प्रतिशत का अंतर नहीं, बल्कि भविष्य के वैश्विक नेतृत्व का अंतर है।
“विडंबना यह भी है कि अनुसंधान के लिए जो बजट आवंटित किया जाता है, उसका बड़ा हिस्सा कई बार पूरी तरह खर्च भी नहीं हो पाता। प्रशासनिक देरी, मंजूरी की जटिल प्रक्रियाएँ, वैज्ञानिक पदों की रिक्तियाँ, उपकरणों की खरीद में बाधाएँ और धन जारी करने की धीमी गति के कारण अनेक शोध परियोजनाएँ वर्षों तक अटकी रहती हैं। प्रयोगशाला में विज्ञान जितनी तेजी से आगे बढ़ता है, सरकारी फाइलों में उसकी गति उतनी ही धीमी पड़ जाती है। किसी भी ज्ञान-आधारित राष्ट्र के लिए यह गंभीर चिंता का विषय है।”
आज चीन विज्ञान महाशक्ति बन चुका है, लेकिन यह सफलता रातोंरात नहीं मिली। चार दशक पहले उसने शिक्षा, अनुसंधान, विश्वविद्यालयों, उद्योग और तकनीक को राष्ट्रीय विकास का केंद्र बनाया। उसने शोध पर अरबों डॉलर खर्च किए, दुनिया भर के वैज्ञानिकों को आकर्षित किया और विदेश गए शोधकर्ताओं को वापस लाने के लिए विशेष नीतियाँ बनाईं। दक्षिण कोरिया ने युद्ध की राख से उठकर अनुसंधान के बल पर सैमसंग, एलजी और हुंडई जैसी वैश्विक कंपनियाँ खड़ी कीं। इज़राइल ने रेगिस्तान में ज्ञान की हरियाली उगा दी। इन देशों ने अमीर बनने के बाद शोध पर खर्च नहीं किया, बल्कि शोध पर निवेश करके अमीर बने।
भारत के पास भी गर्व करने के लिए अनेक उपलब्धियाँ हैं। इसरो ने दुनिया को अपनी क्षमता का परिचय दिया। चंद्रयान और मंगलयान अभियानों ने भारत का परचम अंतरिक्ष में लहराया। कोविड महामारी के दौरान भारतीय वैज्ञानिकों ने रिकॉर्ड समय में वैक्सीन विकसित की। डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में भारत ने दुनिया के सामने नई मिसाल पेश की। आज देश सेमीकंडक्टर, क्वांटम मिशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, हरित हाइड्रोजन, जैव प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में बड़ी छलांग लगाने का प्रयास कर रहा है।
“इसका अर्थ स्पष्ट है—हमारे पास क्षमता भी है, प्रतिभा भी है और संकल्प भी। सवाल केवल इतना है कि क्या ये उपलब्धियाँ अपवाद बनकर रह जाएँगी या राष्ट्रीय संस्कृति का हिस्सा बनेंगी?”
हम अक्सर शिक्षा और अनुसंधान को खर्च मानते हैं, जबकि वास्तव में यह भविष्य की सबसे बड़ी राष्ट्रीय पूँजी है।
राजमार्ग अर्थव्यवस्था को गति देते हैं, बंदरगाह व्यापार बढ़ाते हैं और हवाई अड्डे यात्राएँ आसान बनाते हैं, लेकिन विश्वविद्यालय और प्रयोगशालाएँ किसी राष्ट्र का भविष्य गढ़ते हैं। सड़कें एक शहर को दूसरे शहर से जोड़ती हैं, जबकि अनुसंधान एक पीढ़ी को अगली पीढ़ी से जोड़ता है।
भारत को दुनिया का सबसे बड़ा बाज़ार बनना है या दुनिया की सबसे बड़ी प्रयोगशाला—अब इस प्रश्न से बचा नहीं जा सकता। विकसित भारत की पहचान केवल GDP के आँकड़ों से नहीं होगी। वह दिन तब आएगा जब दुनिया के सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक भारत में शोध करने के लिए उत्सुक होंगे; जब भारतीय छात्रों के लिए विदेश जाना मजबूरी नहीं, बल्कि केवल एक विकल्प होगा; जब भारतीय विश्वविद्यालय नोबेल स्तर के अनुसंधान के लिए पहचाने जाएँगे; जब भारतीय उद्योग अनुसंधान में अरबों रुपये का निवेश करेंगे; और जब अंतरराष्ट्रीय विज्ञान ओलंपियाड में स्वर्ण पदक जीतने वाले छात्रों के नाम हर भारतीय गर्व से याद करेगा।
“राष्ट्र केवल अपनी सीमाओं से महान नहीं बनते। वे अपने सपनों, अपने स्कूलों, अपने विश्वविद्यालयों, अपनी प्रयोगशालाओं और उनमें भविष्य की खोज करने वाले वैज्ञानिकों से महान बनते हैं।”
भारत के पास स्वर्ण पदक जीतने वाली प्रतिभा है। अब उस प्रतिभा को स्वर्णिम भविष्य देने का साहस हमें दिखाना होगा। यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। क्योंकि आने वाले समय में सबसे समृद्ध देश वह नहीं होगा जिसके खजाने में सबसे अधिक धन होगा, बल्कि वह होगा जिसकी प्रयोगशालाओं में सबसे अधिक नए विचार जन्म लेते होंगे।
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