वर्तमान में देश हित में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की शुचिता को लगातार सार्थक कर रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

महाराष्ट्र भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता अजय पाठक ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय को याद करते हुए कहा कि उन का पूरा जीवन राजनीतिक पवित्रता का सूचक है। मानव और मानवता के लिए पूरा जीवन समर्पित करने वाले पंडित जी का व्यक्तित्व शब्दों के संग्रह से परे है । भारतीय राजनीति का अगर कोई आदर्श है तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय। जिनके लिए राजनीति साधन नहीं, साधना थी । पंडित दीनदयाल जी की शुचिता को सार्थक करने में देश के वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मंत्रिमंडल ने पूरी ताकत झोंक दी है।

भारत की एकता और अखंडता पर वह हमेशा कहा करते थे कि “भारत की एकता और अखंडता की साधना हमने हमेशा की है, हमारे राष्ट्र का इतिहास इस साधना का ही इतिहास है’’ उनका मानना था कि इसके लिए कर्म ही नहीं, साधना भी जरूरी है।
भारतीय राजनीति में दीनदयाल जी का प्रवेश कतिपय लोगों को नीचे से ऊपर उठने की कहानी मालुम पड़ती है। किन्तु वास्तविक कथा दूसरी है। दीनदयाल जी ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में रहकर जिस आंतरिक व महती सूक्ष्म भूमिका को प्राप्त कर लिया था, उसी पर वे अपने शेष कर्म शंकुल जीवन में खड़े रहे। उस भूमिका से वे लोकोत्तर हो सकते थे, लोकमय तो वो थे ही। देश के चिन्तक वर्ग को कभी-कभी लगता है कि दीनदयाल जी की राजनीतिक उपलब्धियां कम हैं।
लेकिन सवाल ये है कि क्या अन्य नेताओं की तरह उनमें भी राजनीतिक मत्वाकांक्षा थी?

जीवन में एक बार उनको चुनाव लड़ाया गया, लेकिन उसके लिए उनको किस प्रकार से तैयार किया गया, यह तत्कालीन जनसंघ के नेता अथवा कार्यकर्ता ही बता सकते हैं। जिस दौर में राजनीतिक कुटिलता और जातियों के तिलिस्म से पूरी भारतीय राजनीति ग्रसित थी, उस दौर में ऐसे व्यक्ति का चुनाव लड़ना जो झूठे वादे तो छोड़ दीजिए झूठ बोलने के बारे में सोच भी नहीं सकता था।

कमोबेश यही स्थिती जनसंघ के अध्यक्ष बनने के समय भी उनके साथ हुई थी। अनेक विद्वानों और पंडित जी को करीब से जानने वाले इस बात को बड़े गर्व से स्वीकार करते हैं कि पंडित जी के लिए राजनीति साधन नहीं, साधना थी; यह शत प्रतिशत सही और उन लोगों का अनुभव भी है।
उनके चिंतन में एक ऐसी मौलिकता थी, जो भारतीय इतिहास, परंपरा, राजनीति और भारतीय अर्थनिति से प्रस्फुटित है तथा आधुनिक स्थितियों और आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समर्थ दिशाओं का निर्देशन करती है। उनके चिंतन की प्रेरणा-बिंदु भारत का वह निर्धन, अनिकेत और रूढ़ियों से ग्रस्त नागरिक है, जिससे काल और हर प्रकार के विदेशी आक्रमणों के थपेड़ों के बीच ‘स्व’ और ‘स्वाभिमान’ को अपने निर्बल, दुर्बल और शोषित शरीर में जीवित रखा।

समाजिक जीवन में पिछड़ेपन की समाप्ति की परम आवश्यकता उनके मानस में गहरी बैठी थी। वे दरिद्रनारायण की हृदय से सेवा करने में विश्वास करते थे। उनका मानना था कि जब तक अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति का संपूर्ण विकास नहीं हो जाता, तब तक राष्ट्र के पुननिर्माण का स्वप्न अधूरा है।
आज जिस प्रकार प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी कार्य कर रहें निश्चित ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय के स्वप्नन को पुरा करने की और समर्पित है । यही तो पंडित जी स्वप्नन था ” अंत्योदय ” अर्थात अंतिम छोर के इंसान को भी किसी प्रकार की सुविधाओ से वंचित न रहना पड़े।
